વરસાદ પછીનો ઉઘાડ

गज़ल : जिगर जोशी

Posted on: જાન્યુઆરી 5, 2011

Confused

बहुत पेचीदा हैं ये बात की आखिर किधर जाते
हुनर गर ख्वाब सा होता तो आँखो में उतर जाते

लगा हैं गाँव मे मेला खिलौना माँगते बच्चे
अगर जाते भी हम या-रब, बता किस मूँ से घर जाते

कई सालों से मैं इस पल कि खातिर जी रहा था दोस्त
न आते याद दो पल और तो ये ज़ख्म भर जाते

लहर बन के हुए पैदा किनारे पर ही जाओगे
ठहर जाते कहीं गर राँह में तो यूँ ही मर जाते

सडक के जंगलो से प्यार इक हद से जियादा हैं
वगर ना शाम होते ही “जिगर” भी अपने घर जाते

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5 Responses to "गज़ल : जिगर जोशी"

लहर बन के हुए पैदा किनारे पर ही जाओगे
ठहर जाते कहीं गर राँह में तो यूँ ही मर जाते
સરસ

તમારું હિન્દી ભાષા પર પ્રભુત્વ પણ સારું છે.આ ગમ્યું-
लहर बन के हुए पैदा किनारे पर ही जाओगे
ठहर जाते कहीं गर राँह में तो यूँ ही मर जाते
http://himanshupatel.wordpress.com

बहुत पेचीदा हैं ये बात की आखिर किधर जाते
हुनर गर ख्वाब सा होता तो आँखो में उतर जाते

बहुत अच्छे ! जिगरभाई

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