વરસાદ પછીનો ઉઘાડ

गज़ल : जिगर जोशी

Posted on: ઓગસ્ટ 30, 2011

जिस गली से गुज़रने में बरसो गयें
देर तक आज सोचा उधर क्यों गयें

लौटने में ज़रा देर क्या हो गई
कुछ की दुनिया गई कुछ के घर खो गयें

चंद चींखों की चादर से तन ढक लियाँ
और फिर नींद की धूप में सो गयें

उस की आवाज़ के पेचीदा मुल्क में
खामशीं के मुसाफिर जो थे, खो गये

फस्लें क्या लहलहायेगी सच में ‘जिगर’
जल्दी जल्दी में रिश्ते वो बो तो गयें

शाम की रोशनी में नहाकर ‘जिगर’
ये सडक ये शहर क्या से क्या हो गयें

 

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3 Responses to "गज़ल : जिगर जोशी"

प्यार ही कारण हो सकता है ! 🙂

ना है ज़मीन मेरे पैर के निचे
ना है सीमा मेरे मन के अंदर
दी उडान, मैं उड़ता जाऊ ,
दिया जो दिल , प्यार करता जाऊं

जनक

लौटने में ज़रा देर क्या हो गई
कुछ की दुनिया गई कुछ के घर खो गयें .. waah jigar ji..bahoot khoob..

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